Wednesday, 18 March 2020

रेलवे स्टेशन और तुम

रेलवे स्टेशन पर 
जब मैं 
अनजान-सी आकर 
बैठ जाती हूँ ..
और फिर 
तुम भी किसी 
यात्री की भांति 
आकर बगल में 
जब बैठते हो ...
और 
सिर झुकाकर 
अनजान बनकर 
बात करते हो ..
मैं भी सहमी-सी 
सिर हिलाकर 
हर बात का 
जवाब देती हूँ..
मालूम है कि 
एक शहर में 
रहते हुए 
एक दुसरे को 
जानते हुए भी,
अनजान बनकर 
प्यार करना 
कठिन होता है 
मगर एक सुकून भी 
देता है ||

द्वारा - नीरज 'थिंकर'

तिल - तेरी आँख के किनारे का

तेरी आँख के 
किनारें पर जो 
एक तिल है 
छोटा-सा 
उसकी याद 
कभी-कभी 
अनायास ही 
आ जाती है मुझें,
सोते हुए 
सपने बुनते हुए 
यें तिल पंख लगा 
कर उड़ता है 
संग मेरे,
यें तिल मुस्कुराता-सा 
दिल बाग़-बाग़ करता है 
एक मनोरम संसार भी 
रचता है,
यें तिल मुझें 
तेरा साथ होने का 
एहसास दिलाता है ,
हाँ, तेरा यें तिल 
मुझे बहुत सुहाता है ||

द्वारा - नीरज 'थिंकर' 

Tuesday, 31 December 2019

कविता-बहुत देर तक

बहुत देर तक
बिना रुके,
बिना थके
शहर की हर गली में
चलता रहा ...,
उन नज़ारों को
आँखों में बसाता रहा.....
मेरा ये चलना
और शहर की
ख़ाक छानना
व्यर्थ तो नहीं है
मैं चलकर
क़दमों से उन
एहसासों को
भर लेना चाहता था
जिसमें कभी हर्ष
हर्षोंलासित हो
झूम जाया करती होगी,
उसके उन तमाम
सुनहरे पलों को
मैं अपने साथ ले जाना
चाहता था
इन्हें ले जाकर
 अपने में समाकर
कुछ नूतन रूप में
उसके संग जीना चाहता था
इसीलिए तो मैं
बिना रुके,बिना थके
साँसों को थामे
बेखोफ,बेपरवाह हो
चलता रहा ।

द्वारा - नीरज थिंकर

Sunday, 17 November 2019

कविता - वो दो दिन

वो शहर से
दो दिन के लिए
बाहर था,
शायद किसी दूसरे
शहर में
हो रही सेना की भर्ती में
दोड़ने गया हुआ था,
यें दो दिन उसकी
माशूक़ा के लिए
दो बरस से बीतें,
प्रेमी के शहर आने
से पहले ही
वो घंटो पहले
स्टेशन पर जाकर
 उसका इंतज़ार
करने लग गयी,
माशूक़ के ट्रेन से
उतरते ही वो उससे
लिपट पड़ी
गोया
उसे इन दो दिनों में
जुदाई का एहसास
हो गया हो
और वो अब मानो
एक क्षण के लिए भी
उसे दूर नहीं जाने
देना चाहती हो !

द्वारा- नीरज 'थिंकर'

Saturday, 9 November 2019

कविता- बुद्धा तुम बहुत याद आते हो




इस क्षण में
बुद्धा तुम
बहुत याद आते हो,
चारो तरफ फ़ैले
तनाव में भी
तुम सुकून एक
दे जाते हो,
जब हर कोई
आतुर है
मारने एक-दूजे को
तब तुम ही
संयमता बरतना
सिखाते हो,
नफ़रतों की आँधियाँ
जब
सबकों उड़ायें जाती है
तब
तुम ही हो बुद्धा
जो मुझें बचाकर
लाते हो,
भीड़ का हिस्सा बनना
चाहूँ भी तो,
तुम
हर दफ़ा
अपनी शरण में
खींच लाते हो,
जो हो रहा है
बीत जायेगा
उन्मादों का भंवर
भी बिखरेगा
तुम्हारी नश्वरता की
यें बातें
हर वक़्त मुझें
उन्मादी होने से
बचाती है,
इस क्षण में
बुद्धा तुम
बहुत याद आते हो ||

द्वारा- नीरज 'थिंकर'

Tuesday, 5 November 2019

कविता - क्या तुम जानते हो ?


क्या तुम 
एक शहर में 
रहकर भी 
न मिल पाने का 
दर्द जानते हो ?
सामने होने पर भी 
गले न मिल पाने की 
चाह को दबाने 
की घुटन 
क्या तुम महसूस 
कर सकते हो ?
चंद फ़ासलों की 
दूरी को 
घंटों फोन पर 
बतियाकर पूरी 
करने की 
नाकामयाब कोशिश 
बार-बार करना,
फिर 
एक आलिंगन की 
चाह लिए 
उसकी डगर चलना 
अंततः झलक पाकर 
ही 
लौटकर आने का 
गम 
क्या तुम जानते हो ?

द्वारा- नीरज 'थिंकर'

Saturday, 6 July 2019

मनोरम मुस्कान तेरी

तेरी इस मनोरम
मुस्कान से लिपटीं
खुशियाँ
जिसमें बेफ़िक्री है,
उन्माद है, एक अल्हड़पन
भी है,
को पाने के लिए
तुझपर
न्योछावर कर सकता हूँ
सबकुछ अपना,
बन सकता हूँ
अलमस्त फ़क़ीर,
ज़ी सकता हूँ सिर्फ
तेरी इस तिलिस्म-सी
मुस्कान के सहारे,
चूका सकता हूँ
इस मंदिम मुस्कान
की क़ीमत
बेचकर सब कुछ अपना ,
बन सकता हूँ कर्जदार
जीवन भर तेरा
सिर्फ़ मुर्छित कर देने वाली
तेरी इस मुस्कान पर

द्वारा- नीरज 'थिंकर' 

Saturday, 15 December 2018

ठण्ड और वो

ठिठुरन पैदा कर देने 
वाली सर्दी में भी 
उसका,
सिर्फ कंधो तक ही 
चादर को ओढना,
ऐसा नहीं है कि 
उसे ठण्ड नहीं लगती है 
इसका अंदाजा उसके 
दोनों हाथों का जेब में 
निरंतर सिकुड़ते हुए रहने से 
बख़ूबी लगाया जा सकता है, 
पर 
बस उसे खुले बालों में 
रहना अच्छा लगता है,
और साथ ही 
लोगों को इस कड़ाके की 
ठण्ड में 
घायल करना भी |

द्वारा - नीरज 'थिंकर'

Friday, 21 September 2018

कविता - समाज और वो

उसकी आँखों में  आंसू 
समाज की देन है ,
इच्छाओ का महल 
न बन पाना 
उसमे सजाये ख़्वाबो 
का न सज पाना 
इन सब का ज़िम्मेदार 
समाज ही तो है ,
वो समाज जो 
खुद तो न कर सका प्रेम 
     न दे सका प्रेम 
     न ले सका प्रेम 
मगर 
दुसरो की इच्छाओ को 
पूरा होते देख 
वह चैन की साँस भी तो 
नहीं ले सका ,
खुशियों को म्रतप्राय करना 
समाज की ही तो देन है |

नीरज 'थिंकर'

कविता - तुम एक कविता हो

तुम एक ख़ूबसूरत - सी 
कविता हो माही,
तुम्हारी आँखे 
अलंकार - सी चमकती है ,
तुम्हारे होंठ 
सौन्दर्य का भाव है माही ,
तुम्हारी चाल 
छंदों से लदी - सी चलती है ,
तुम्हारी बातें 
चाँद की उपमा-सी 
इठलाती है,
तुम्हारी हँसी 
कविता का सार है माही | 

द्वारा- नीरज 'थिंकर'


Thursday, 19 April 2018

कविता - हंसी कैसे आएगी ?

इच्छाओ को जब 
दबा दिया जाए 
तो 
हंसी कैसे आएगी ? 
स्वतंत्रता जब 
छीन ली जाए 
लिंग के आधार पर 
तो 
हंसी कैसे आएगी ?
सपने जब 
टूट जाए सारे ,
आशाएं जब 
धूमिल हो जाए 
तो 
हंसी कैसे आएगी ?
मंजिल की और
बढ़ने वाले कदमों को जब 
बढ़ने से पहले ही
काट दिया जाए 
तो 
हंसी कैसे आएगी ?
इमारत जब 

बनने से पहले ही 
ढहा दी जाए 
और 
उसमे निर्मित ख़्वाबो 
का जब 
क़त्ल कर दिया जाए 
तो 
हंसी कैसे आएगी ?
कुछ करने के जुनून 
का जब 
पितृसत्तात्मक समाज द्वारा 
गला घोंट दिया जाए ,
परम्परा से हटकर 
लिए गए फैसले को जब 
पैरों तले रौंद दिया जाए 
तो 
हंसी कैसे आएगी ?

द्वारा - नीरज 'थिंकर'

एक पत्र दादा जी के नाम

दादा जी                                        आपके जाने के   ठीक एक महीने बाद   मैं लिख रहा हूँ पत्र   आपके नाम , मैं पहले...