Saturday, 4 April 2020

बहुत दिन हुए

बहुत दिन हुए
तुझे देखे
तेरे पास बैठ बतियाएं ,
कि
तेरे साथ गुनगुनाएं ,
बित चली कई रातें
बिन तुझसे नैन लड़ाएं ,
कि
तेरी जुल्फ़े संवारें
तुझसे इश्क़ लड़ाएं ,
तुझको अपने दिल
की बात बताएं
तुझसे तेरे दिल की
बात सुने
बहुत दिन हुए !!

द्वारा - नीरज 'थिंकर'



आँखें

आँखों को ला इतनी पास
कि
डूब सकूँ मैं उनमें, ,
कि
पा सकूँ मैं सुकून
भरा एहसास ,
कि
कर सकूँ मैं उनसे
दो बात
बिखेर सकूँ मैं किस्सों
के हुजूम को ,
कि
ज़ी सकूँ मैं उनमें
जिंदगी के दो पल ,
कि
खो सकूँ में उनमें
अनन्त समय के लिए !!

द्वारा - नीरज  'थिंकर'  

Friday, 3 April 2020

जूनून

जूनून मिलने का अब
ख़त्म होने लगा है ,
प्यार भरी बातें भी अब
फीकी पड़ने लगी है,
स्वप्न भविष्य के बुनना अब
कम होने लगा है ,
ढूँढ एकांत प्रेमानुराग में
लिप्त होने की लालसा अब
कम होने लगी है ,
यादें उसकी अब
धूमिल पड़ने लगी है ,
ख़ूबसूरती का ख़ुमार भी अब
धीरे-धीरे उतरने लगा है !!

द्वारा- नीरज 'थिंकर' 

डर और प्यार

ये प्यार इतना डरा
हुआ क्यों है ?
इसको नज़र किसकी
लगी है ?
ये प्रेमी जोड़े किससे
बचते फिर रहे है ?
पग-पग पर ये
सहमते जाते
एकांत तलाशते
किससे भाग रहे है ?
ये प्यार को अब
हो क्या गया है ?
किसी की आहट मात्र से
क्यों कांप उठता है ?
क्यों कोई प्रेमी अब
अपनी प्रेमिका की
जुल्फ़े संवारने से डरता है ?
क्यों कोई माशूका अब
अपने प्रेमी के कर में कर डाल
निःसंकोच होकर नहीं चलती है ?
ये प्यार इतना डरा हुआ क्यों है -२

द्वारा - नीरज 'थिंकर'

दिल्ली और मैं

दिल्ली अब दिल्ली-सी
लगने लगी है
यह जगह अब अपनी -सी
लगने लगी है,
भले ही हो यहाँ पर
समस्याएं अनेक
पर
दिल्ली अब मन को
भाने लगी है,
ये कॉलेज, ये हॉस्टल
सब अपना-सा लगने लगा है,
यहाँ की दीवारे भी अब
पहचानने लगी है,
यहाँ लगे पेड़-पौधे से
भी अब
बात होने लगी है,
यहाँ पड़ने वाली
कड़ाके की सर्दी से भी
अब
मोहब्बत होने लगी है !!

ये आग

ये आग क्यों दहक रही है ?
नज़ारे क्यों खामोश है ?
ये लोग क्यों जा रहे है
लिए आँखों में ज्वाला अपनी ?
ये जो कोहरा छाया हुआ है
सब कुछ इसमें समाया हुआ है ,
क्यों कहीं कोई प्यार नजर नहीं
आ रहा है ?
हर तरफ अन्धकार छा रहा है,
लोगो के चेहरे पर जो
ये आक्रोश नज़र आ रहा है
रंगबिरंगे इस शहर में
नफरत घोलता जा रहा है ,
सबको क्या हो गया है ये ?
हाथ में लिए हथियार सभी
किस ओर जा रहे है ?

द्वारा - नीरज 'थिंकर' 

तुझको देख कर

आज तुझे देखा तो
ऐसा लगा था
मेरा ख़वाब सच
हो गया ,
तू मेरे इतने करीब थी
मिलने से पहले हजार
थे सवाल
तुझसे मिला आज तो
सवालो का हुजूम
ख़त्म हो गया,
तेरे कोमल नयन थे
मेरी आँखों के इतने पास
लगा स्वप्नलोक में
मेरा प्रवेश हो गया ,
तेरे मृदुल हाथ थे
मेरे हाथों में
लगा कि
डर दुनिया का सारा अब
 ख़त्म हो गया !!

द्वारा - नीरज 'थिंकर' 

Wednesday, 1 April 2020

तुम मेरे लिए काफ़ी हो

तुम्हारा मेरे पास    
बैठकर 
मुझे निहारना 
समुन्द्र की 
लहरों में 
मेरा हाथ थाम कर 
चलना 
मेरे लिए काफ़ी है,
पथरीली राहों में 
नीले गगन के नीचे 
सुनसान सड़क पर 
तुम्हारा साथ होना 
काफ़ी है,
हर मुश्किल घड़ी में 
तुम्हारा हल्का-सा 
मुस्कुरा जाना 
मेरे लिए काफ़ी है,
तुम कहीं भी रहो 
पर 
पास होने का एक 
एहसास तुम्हारा 
मेरे लिए काफ़ी है,
तुम्हारा बेझिझक होकर 
मुझसे बाते करना 
और 
बातों ही बातोँ में 
मुझे गले लगाना 
मेरे लिए काफ़ी है,
तुम्हारा चेहरा 
हर परेशानी जो 
मेरी हर लेता है
और 
मेरे ग़मों को 
खुशियों में जो 
बदल देता है 
मेरे लिए काफ़ी है,
ज़माना हो भले ही 
ख़िलाफ़ मेरे 
तो होने दो
सब कुछ लुट जाए 
मेरा मुझसे तो 
लुट जाने दो 
तुम साथ हो 
मेरे लिए
इतना ही काफ़ी है -2

द्वारा- नीरज 'थिंकर' 

कोरोना काल में

Pic courtesy - Scroll.in
जब भटक रहा है 
इंसान दर-ब-दर 
तब तुम 
हाथ धोना उसे 
सीखा रहें हो,
है नहीं घर 
पास उसके 
फिर भी 
तुम उसे घर बैठना 
सीखा रहें हो,
वर्षों से झेली है 
'सामाजिक दूरी' 
जिसने, उसे तुम 
'सोशल डिस्टैन्सिंग' 
सीखा रहें हो ,
भूखा है पेट
बिलख़ रहें है बच्चे 
और 
तुम उसे डंडे की 
मार से डरा रहें हो,
अपने ही देश में 
लोग जब बेघर 
हो जाए
महामारी से ज्यादा 
भूख जब उन्हें 
सताने लगे,
तब तुम नाप 
सकते हो 
देश की तररकी 
और 
देख सकते हो 
विकास को करीब से
बहुत करीब से !!



द्वारा - नीरज 'थिंकर'

Friday, 27 March 2020

नीला है जग सारा

नीला है आसमां 
नीली है यें दीवारे 
घर की मेरे,
नीले है आसमां से 
लिपटे यें तारे 
नीली है यें नजरें 
देखती है जो इन्हें,
नीली है यें जमीं 
इस पर चलने 
वाला हर 
शख्स है नीला,
सातों समुन्द्र है नीले
नीला है वो जहाज 
जो 
चलता है अंदर इसके,
नीले है ये बादल 
नीली है बूंदे
बरसती है जो इनसे,
 नीला है वो झंडा 
जिस पर लिखा है 
नारा जय भीम का,
बाबा साहब का कोट
नीला 
नीला है कलम कांशीराम का 
सावित्रीबाई की साड़ी नीली
नीली है किताब संविधान की,
नीला है खेत 
हल जोतने वाला
किसान भी नीला 
धान नीला 
इसे खाने वाला
इंसान नीला,
नीली है मेरी हर ख्वाहिसे 
नीली है मेरी सारी चाहते ....- 3

द्वारा - नीरज  'थिंकर'



Wednesday, 25 March 2020

लॉकडाउन और तुम

इक्कीस दिनों का
यें लॉकडाउन 
तुम्हारे बिन 
मुश्किल है,
पर जीवन में 
हमेशा साथ होने 
के लिए 
यें दूरी
जरूरी भी तो है,
मालूम है कि
सब कुछ ठीक 
हो जायेगा
पर 
एक भय गहरा-सा 
सब कुछ ठहरा-सा 
स्मृतियां लाता है 
पुरानी 
बीती जो संग तुम्हारे
वो रातें याद आती है 
जो काली थी 
मगर उजली-सी 
लगती थी
आने वाली रातें 
कैसी होगी ?
सोचकर मन 
भयभीत हुए जाता है ..
लेकिन 
धुंधली-सी तुम्हारी 
वो मुस्कान 
सब कुछ भुला दिए 
जाती है 
और
फिर से तुमसे मिलने 
की चाह 
मन में उमंग भरे 
जाती है !!!

द्वारा - नीरज 'थिंकर'

एक पत्र दादा जी के नाम

दादा जी                                        आपके जाने के   ठीक एक महीने बाद   मैं लिख रहा हूँ पत्र   आपके नाम , मैं पहले...