Sunday, 5 April 2020

एक कसक

एक कसक मन में रह गयी                                  
बिन मिले ही ये रात ढल गयी,
हंसीं जो खिलखिला रही थी
पास मेरे
बिन कुछ कहे ही चली गयी,
होंठ जो कहने वाले थे
कुछ बात तेरे
बिन बात किए ही
सिल गये,
आँखें जो करने वाली थी
नजाकत साथ मेरे
ना जाने क्या बात थी कि
बिन कुछ करे ही
सो गयी,
ये रात ना जाने क्यों प्यारे
बिना उसके आलिंगन के ही
सुबह में हो गयी,
एक कसक थी जो मन में प्यारे
मन में ही रह गयी ||

द्वारा - नीरज 'थिंकर'

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